झंझावातो के बीच झूम

 झंझावातो के बीच झूम


झंझावातो के बीच झूम

तू निकल शान्ति की तलाश में

बन चन्दन सज भुजंग बीच

फैला सौरभ तू हवाओं में

बाधाएं जितनी भी हो

संघर्ष कभी भी कम न हो

देह जनित पीड़ा से अपने

मन की आभा कम न हो

ऋतुएँ आनी जानी हो

घटा घोर कजरारी हो

पर जो सूरज को मिटा सके

कभी ऐसा मेघ उदित न हो

भय के बादल छाएगे

नित नये रूप दिखलाएगे

आत्मशक्ति पर तेरे बन वे

तीव्र शूल गिर जाएगे

पर कुन्दन सा तप कर के

तू निकल कान्ति की तलाश में

झंझावातो के बीच झूम

तू निकल शान्ति की तलाश में



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