आदर्श द्रव और बरनौली सिद्धांत/ बरनौली प्रमेय शैक्षणिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए भौतिक विज्ञान का यह टाॅपिक डाॅ कल्पना सिंह के साथ
आदर्श द्रव और बरनौली सिद्धांत/ बरनौली प्रमेय
शैक्षणिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए भौतिक विज्ञान का यह टाॅपिक
डाॅ कल्पना सिंह के साथ
ऊर्जा संरक्षण नियम पर आधारित बरनौली सिद्धांत, जिसे स्विस भौतिक विज्ञानी डेनियल बरनौली ने दिया था, निम्नवत् है.
आदर्श द्रव की धारा रेखीय प्रवाह मे, एकांक आयतन की दाब ऊर्जा, गतिज ऊर्जा एवम स्थितिज ऊर्जा का योग स्थिर रहता है.
जिसे निम्न प्रकार से लिख सकते हैं.
P1+ 1/2 ρv12 + ρgh1= P2+1/2 ρv22 + ρgh2
या
P+ 1/2 ρv2 + ρgh = नियतांक
इसे इस प्रकार भी लिखते है
किसी असम्पीड्य और अश्यान द्रव जो कि अपरिवर्ती और अघूर्णी प्रवाह में हो की धारा रेखा के प्रत्येक बिन्दु पर एकांक आयतन की दाब ऊर्जा, गतिज ऊर्जा एवम स्थितिज ऊर्जा का योग स्थिर रहता है.
क्यों कि आदर्श द्रव वह है जिसमें निम्न गुण होते हैं
1- असम्पीड्य ( incompressible) - अर्थात प्रवाह के दौरान प्रत्येक बिंदु पर द्रव का घनत्व स्थिर रहता है.
2- अश्यान ( Non- viscous) - अर्थात द्रव की परतों के बीच कोई आंतरिक घर्षण बल नहीं होता है
3- अपरिवर्ती प्रवाह ( steady flow) - अर्थात प्रत्येक बिन्दु पर द्रव का वेग, परिमाण और दिशा में समान रहता है.
4- अपूर्णीय प्रवाह (irrotational flow) - द्रव में किसी भी बिन्दु के परित: कोणीय संवेग शून्य रहेगा अर्थात इस प्रकार के द्रव के अंदर रखे किसी छोटे पहिए के द्रव्यमान केन्द्र के परित: घूर्णन गति नहीं होगी.
बरनौली सिद्धांत/ बरनौली प्रमेय को निम्न प्रकार से सिद्ध कर सकते हैं-
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| चित्र 1 |
P1+ 1/2 ρv12 + ρgh1= P2+1/2 ρv22 + ρgh2
यह सिद्ध करने के लिए, चित्र 1 के आधार पर, हम सर्वप्रथम बिन्दु B पर द्रव पर किए गए कार्य और बिन्दु D पर द्रव द्वारा वायुमंडल के विरूद्ध किए गए कार्य की गणना कर, द्रव पर किए गए कार्य से द्रव द्वारा किए गए कार्य को घटा कर, द्रव पर किए गए कुल कार्य की गणना करते हैं. द्रव पर किया गया कुल कार्य, ऊर्जा संरक्षण नियम के अनुसार व्यर्थ नही जाता, बल्कि उसके बराबर ऊर्जा में वृद्धि होती है. यह ऊर्जा की वृद्धि गतिज और स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि के योग के बराबर होती है. ऊर्जा में वृद्धि को आदर्श द्रव पर किए गए कुल कार्य के बराबर रखने पर, बरनौली प्रमेय सिद्ध हो जाता है.
इसे निम्न प्रकार से करते हैं.
चित्र 1 के अनुसार आदर्श द्रव को धारा रेखीय प्रवाह में मान लेते हैं.
प्रारम्भ में धारा रेखीय प्रवाह में द्रव को B और D के बीच मानते हैं.
B पर द्रव का वेग v1 और D पर द्रव का वेग v2 है.
∆t समय में, बिन्दु B पर द्रव द्वारा चली गई दूरी = चालxसमय = v1 ∆t
v1 ∆t इतनी छोटी दूरी है जिसमें द्रव नली के अनुप्रस्थ काट को एक समान माना जा सकता है, जिसका मान बिन्दु B पर अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल A1 के बराबर ले सकते हैं.
इसी प्रकार बिन्दु D पर द्रव ∆t समय में v2 ∆t दूरी चलेगा, यहाँ अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल बिन्दु D पर अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल A2 के बराबर होगा.
क्षेत्रफल A1 पर दाब P1 और A2 पर दाब P2 है.
बिन्दु B पर द्रव पर ∆t समय में किया गया कार्य W1 = बलxविस्थापन = P1 A1 v1 ∆t
इसी प्रकार बिन्दु D पर द्रव द्वारा, वायुमंडलीय दाब के विरुद्ध किया गया कार्य = P2 A2 v2 ∆t
द्रव पर किया गया कुल कार्य = P1 A1 v1 ∆t - P2 A2 v2 ∆t
अ्विरतता के सिद्धांत से, A1 v1 = A2 v2
इसलिए A1 v1∆t= A2 v2 ∆t = ∆V, ∆V द्रव की नली से ∆t समय में गुजरने वाले द्रव का आयतन है.
अत: द्रव पर किया गया कुल कार्य = P1 A1 v1 ∆t - P2 A2 v2 ∆t = ( P1 - P2 ) ∆V —------(1)
ऊर्जा संरक्षण के नियम से, द्रव पर किया गया कुल कार्य, द्रव की ऊर्जा में वृद्धि करता है = B से D तक जाने में द्रव की ऊर्जा में होने वाली वृद्धि = गतिज ऊर्जा में वृद्धि+ स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि
यदि द्रव का घनत्व ρ है, तो ∆t समय में पाइप से गुजरने वाले द्रव का द्रव्यमान ∆m = ρA1v1∆t =ρA2v2∆t= ρ ∆V.
अत: स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन ∆U= ∆m×gh2- ∆m ×gh1= ρg∆V(h2-h1) —---------(2)
B से D तक जाने में द्रव की गतिज ऊर्जा में परिवर्तन= 1/2∆mv22- 1/2∆mv12=1/2 ρ ∆V(v22- v12). —--(3)
चूंकि, ऊर्जा संरक्षण के नियम से, द्रव पर किया गया कुल कार्य = B से D तक जाने में द्रव की ऊर्जा में होने वाली वृद्धि = गतिज ऊर्जा में वृद्धि+ स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि
अत: समीकरण 1,2 व 3 से
(P1-P2) ∆V = 1/2 ρ ∆V(v22- v12) + ρg∆V(h2-h1)
दोनों पक्षों में ∆V से भाग देने पर
(P1-P2) = 1/2 ρ (v22- v12) + ρg(h2-h1) —---(4)
उपरोक्त समीकरण 4 में पदों को पुनर्व्यवस्थित करने पर
P1+ 1/2 ρv12 + ρgh1= P2+1/2 ρv22+ ρgh2
यही बरनौली प्रमेय है.
जिसे हम निम्न प्रकार से भी लिख सकते हैं.
P+ 1/2 ρv2 + ρgh= constant
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