Carnot’s Reversible Heat Engine कारनाॅट व्युत्क्रमणीय ऊष्मा इंजन या कारनाॅट ऊष्मा इंजन शैक्षणिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए भौतिक विज्ञान का यह टाॅपिक डाॅ कल्पना सिंह के साथ

                   Carnot’s Reversible Heat Engine

कारनाॅट  व्युत्क्रमणीय ऊष्मा इंजन

या

कारनाॅट ऊष्मा इंजन

शैक्षणिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए भौतिक विज्ञान का यह टाॅपिक

डाॅ कल्पना सिंह के साथ


ऊष्मा इंजन के महत्वपूर्ण तथ्य-

ऊष्मा इंजन, ऊष्मीय ऊर्जा को कार्य में परिवर्तित करने की युक्ति है.

वैज्ञानिक साडी कारनाॅट ने आदर्श ऊष्मा इंजन की परिकल्पना प्रस्तुत किया था.

यह पूर्णतः व्युत्क्रमणीय चक्र पर आधारित है जिसे कारनाॅट चक्र कहते हैं.

कारनाॅट ऊष्मा इंजन, इंजन द्वारा अवशोषित अधिकतम ऊष्मा को कार्य में परिवर्तित कर देता है.

समान तापमान के बीच कार्य करने वाले सभी व्यवहारिक ऊष्मा इंजनों में, कारनाॅट ऊष्मा इंजन से कम दक्षता ही पायी जाती है.

कारनाॅट ऊष्मा इंजन की दक्षता भी 100% नहीं होती है.

ऊष्मा इंजन के महत्वपूर्ण घटक-

1- उच्च ताप कुण्ड या ऊष्मा स्रोत

2- निम्न ताप कुण्ड

3- कार्यकारी पदार्थ

4- ऊष्मारोधी आधार

उच्च ताप कुण्ड या ऊष्मा स्रोत - स्रोत, एक निश्चित उच्च ताप T1  पर बना रहता है, जिससे ऊष्मा इंजन निरंतर ऊष्मा ले सकता है, परन्तु इसके तापमान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. इसकी ऊष्मा धारिता अनन्त होती है.

निम्न ताप कुण्ड- यह निश्चित निम्न ताप T2 पर एक कुण्ड है, जिसे जितनी भी ऊष्मा दी जाए, इसका ताप नहीं बदलता, इसकी ऊष्मा धारिता अनन्त होती है.

कार्यकारी पदार्थ - कार्यकारी पदार्थ, आदर्श गैस होती है, जो कि एक सिलेंडर , जिसकी दीवारें पूर्णतः ऊष्मारोधी तथा आधार पूर्णतः ऊष्मा का सुचालक होता है, में होती है. सिलेंडर में ऊपर की तरफ पूर्णतः ऊष्मारोधी तथा घर्षणरहित पिस्टन लगा होता है.

ऊष्मारोधी आधार - यह ऊष्मारोधी आधार है, जिस पर सिलेंडर को रखने पर इसका आधार भी ऊष्मारोधी हो जाता है.

चित्र 1



कारनाॅट चक्र - 

चित्र 2


कारनाॅट ऊष्मा इंजन एक पूर्णतः व्युत्क्रमणीय चक्र पर आधारित है जिसे कारनाॅट चक्र कहते हैं.

यह चक्र, दो समतापी एवं दो रूद्धोष्म व्युत्क्रमणीय प्रक्रमों से बना होता है.

1- समतापी प्रसार

2- रूद्धोष्म प्रसार

3- समतापी सम्पीडन

4- रूद्धोष्म सम्पीडन

समतापी प्रसार - हम कार्यकारी पदार्थ से भरे सिलेंडर को T1 तापमान के स्रोत के ऊपर रखते हैं.

अब कार्यकारी पदार्थ भी तापमान T1, दाब P1, और आयतन V1 पर होगा, जैसा कि चित्र 2 मे बिन्दु A पर दिखाया गया है.

अब दाब घटाते है और आयतन बढ़ाते है, कार्यकारी पदार्थ कार्य करते हुए प्रसार करता हुआ बिन्दु B पर पहुँच जाता है.

सिलेंडर की तली पूर्ण रूप से सुचालक है, अत: कार्यकारी पदार्थ T1 तापमान पर H1 ऊष्मा अवशोषित करते हुए A से  B तक प्रसार करता है.

यहाँ हम कार्यकारी पदार्थ का एक ग्राम अणु लेते हैं

A से B तक समतापी प्रसार मे किया गया कार्य 

W1= ∫V1v2P.dv = RT1log V2/V1= area ABGE

रूद्धोष्म प्रसार - अब हम उसी सिलेंडर को ऊष्मारोधी आधार के ऊपर रखते हैं.

कार्यकारी पदार्थ का दाब घटता है और आयतन बढ़ता है.

यह पूर्ण रूप से रूद्धोष्म प्रक्रम है अतः इसमें कार्य आन्तरिक ऊर्जा की कीमत पर होता है.

B से C तक होने वाले इस रूद्धोष्म प्रक्रम में तापमान गिर कर T1  से T2 हो जाता है.

  

B से C तक रूद्धोष्म प्रक्रम में किया गया कार्य, W2= ∫V2V3P.dv = k∫V2V3dv/VΓ  जैसा कि रूद्धोष्म प्रक्रम के लिए PVΓ= k = स्थिरांक,

W2= (kV31-Γ – k V21-Γ )/(1-Γ ) 

 PV Γ = k  से , P3V3Γ =P2V2Γ= k

इसलिए W2= (P3V3–P2V2)/(1-Γ )

गैस समीकरण से P2V2 = RT1 and P3V3 = RT2

W2= R(T2 – T1 )/(1-Γ ) = R(T1 – T2 )/(Γ -1 ) = Area BCHG


समतापी सम्पीडन - अब तापमान T2 पर, सिलेंडर को शीत कुण्ड या निम्न ताप कुण्ड या सिंक पर रखते हैं. दाब बढ़ाते हैं और कार्यकारी पदार्थ पर कार्य किया जाता है.

सिलेंडर की तली पूर्ण सुचालक होने के कारण, प्रक्रम समतापी है. तापमान T2 पर H2 ऊष्मा कार्यकारी पदार्थ से सिंक में चला जाता है, इस प्रकार पदार्थ समतापी प्रक्रम से C से D तक आ जाता है.

C से D तक समतापी प्रक्रम में किया गया कार्य, 

W3= ∫V3V4P.dv = -RT2 log V3/V4 = area CHFD

यहाँ ऋणात्मक चिन्ह का अर्थ है कि कार्य कार्यकारी पदार्थ पर किया जा रहा है.


रूद्धोष्म सम्पीडन - अब उसी सिलेंडर को ऊष्मारोधी आधार पर रखते हुए दाब को बढ़ाते हैं और आयतन घटाते है.

यह प्रक्रम D से A तक पूर्णतः रूद्धोष्म होता है. जिसमें तापमान T2  से बढ़ कर T1 हो जाता है.

D से A तक रूद्धोष्म प्रक्रम में कार्यकारी पदार्थ पर किया गया कार्य,  

W4= ∫V4V1P.dv = k∫V4V1dv/VΓ 

रूद्धोष्म प्रक्रम के लिए PV Γ = k = स्थिरांक , 

W4= (kV11-Γ – k V41-Γ )/(1-Γ ) 

PVΓ = k ,  अत: P1V1Γ = P4V4Γ = k

अत: W4= (P1V1 – P4V4 )/(1-Γ )

गैस समीकरण से P4V4 = RT2 and P1V1 = RT1

W4= R(T1 – T2 )/(1-Γ ) = -R(T1 – T2 )/(Γ -1 ) = Area DFEA


एक पूर्ण चक्र में कार्यकारी पदार्थ द्वारा किया गया कार्य -


एक पूर्ण चक्र में कार्यकारी पदार्थ द्वारा किया गया कार्य = समतापी प्रसार में कार्य + रूद्धोष्म प्रसार में कार्य +समतापी सम्पीडन में कार्य + रूद्धोष्म सम्पीडन में कार्य

ग्राफ से-

W = area ABGE + area BCHG - area CHFD - area DFEA= area ABCD

गणना द्वारा-

W = W1 + W2+ W3 +W4

W = RT1 log V2/V1  + R(T1 – T2 )/(Γ -1 ) - RT2 log V3/V4 - R(T1 – T2 )/(Γ -1 ) 

W = RT1 log V2/V1  - RT2 log V3/V4  .------- a


चित्र 2 में बिन्दु A और D एक ही रूद्धोष्म वक्र पर है, अत:

T1V1 Γ -1 = T2V4 Γ -1 .

इस लिए T2/T1 = (V1/V4) Γ -1 -----------------(1)

इसी प्रकार बिन्दु B और C भी एक ही रूद्धोष्म पर है, अत:

T1V2 Γ -1 = T2V3 Γ -1 .

इसलिए T2/T1 = (V2/V3) Γ -1 --------------(2)

समीकरण (1) और (2) से

(V1/V4) Γ -1 = (V2/V3) Γ -1 

अत: V1/V4 = V2/V3

इसलिए V2/V1 = V3/V4 —-----------b


समीकरण b का मान समीकरण a में रखने पर

W = RT1 log V2/V1  - RT2 log V2/V1  .

W = R( log V2/V1  )(T1-T2 )  .

W = H1-H2



कारनाॅट ऊष्मा इंजन की दक्षता-

दक्षता ŋ = एक चक्र में किया गया कार्य/एक चक्र में ली गई ऊष्मा= W/H1.

स्रोत से कार्यकारी पदार्थ को ऊष्मा केवल A से B तक समतापी प्रक्रम में ही दी जाती है, अत:

So H1= RT1 log V2/V1 

इसलिए, ŋ =  W/H1=  H1-H2/ H1=  [R(logV2/V1)(T1-T2 )]/ RT1 log V2/V1  .

अत: , ŋ = 1-H2/ H1= 1-T2/T1.



उपरोक्त, कारनाॅट इंजन पूर्णतः उत्क्रमणीय है.

यह विपरीत दिशा में भी कार्य कर सकता है, उस स्थिति में यह रेफ्रिजरेटर कहलाता है. जो शीत कुण्ड से H2 ऊष्मा लेता है, कार्यकारी पदार्थ पर वाह्य कार्य किया जाता है, तत्पश्चात H1 ऊष्मा कार्यकारी पदार्थ से तप्तकुण्ड को दी जाती है.

इस प्रकार रेफ्रिजरेटर में ऊष्मा कम ताप से अधिक ताप की ओर जाती है.

 
अधिक जानकारी के लिए वीडियो पर क्लिक करें





टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

महिलाओं के प्रति आम होते जघन्य अपराध एवं विधिक सुरक्षा

आदर्श द्रव और बरनौली सिद्धांत/ बरनौली प्रमेय शैक्षणिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए भौतिक विज्ञान का यह टाॅपिक डाॅ कल्पना सिंह के साथ