वट वृक्ष, स्वरचित पंक्तियाँ द्वारा डाॅ कल्पना सिंह

                वट वृक्ष


तूफानो में सीना ताने

डटे हुए रहते हैं

बने वृक्ष वट का हम 

धरणी को जकड़े रहते हैं

पोषित होकर माँ से हम

तरुवर विशाल बनते हैं

पथिको के हित तब तो हम

शीतल छाया गढ़ते हैं

मुझसे होकर ही जीवों के

घर जीवन चलते हैं

परहित में हम डटे हुए

कर्तव्य मगन रहते हैं

थक कर मेरे प्रांगण में जब

शरण पथिक लेते हैं

शीतलता से हम उसकी

सारी पीड़ा हरते हैं

सीख कहानी वटवृक्षों की

हर्षित हम रहते हैं

जो भी मुझमें है अर्पण कर

जीवन सार्थक करते हैं

और अपनी शक्ति पर 

फिर फिर गर्वित हम होते हैं

तूफानो में सीना ताने

डटे हुए रहते हैं


स्वरचित पंक्तियाँ द्वारा डाॅ कल्पना सिंह


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