नारी-गौरव-गरिमा और महिमा

                           नारी-गौरव-गरिमा और महिमा


‘‘ मर्यादा कुर्बानी हूॅ,

मै ही मीरा दीवानी हूॅ,

शौर्य पूर्ण कहानी हूॅ,

वीरो की मै रानी हूॅ,

सावन की रिमझिम मै हूॅ,

मै चांदनी रात निराली हूॅ,

नदियो के लहरो सी हूँ मैं,

फॅूलो की खुशबू सी हूॅ,

कर्त्तव्यो के प्रागंण में मै,

तपती जेठ दोपहरी हूॅ,

कर दे प्राण न्योछावर ऐसी 

भारत मॉ की प्रहरी हूॅं।’’


विश्व पटल पर भारतीय नारी के गौरव का गान उसमे निहित बहुआयामी दैवीय गुणो के कारण ही होता है, उसके ऐश्वर्य की महिमा न मात्र उसके जीवन काल में अपितु जीवन के पश्चात भी युगो तक कही जाती है, यह तथ्य ही भारतीय नारी की गरिमा को प्रतिबिम्बित करता है।

भारतीय नारी का समर्पण एवं सेवाभाव उसे समाज एवं परिवार में महत्वपूर्ण स्थान देता है एवं उसे सबका प्रिय बनाता है। भारतीय नारी की शिक्षा, ज्ञान , संस्कृति एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति उसके गौरवपूर्ण जीवन के सर्वप्रमुख अंग है। उसके साहसिक एवं दृढनिश्चयी गुणो की महिमा का गान सर्वत्र होता है।

भारत धर्म एवं वेदो की प्रतिष्ठित भूमि है जिसने विश्व को धर्म पूर्ण विज्ञान के ज्ञान से आलोकित कर सृजनात्मक विज्ञान की महत्ता को स्थापित किया है। इसमे भारतीय नारी की प्रतिष्ठित स्थिति का उल्लेख मिलता है। हमारे इतिहास मे गार्गी, गौतमी, मैत्रे, लोपमुद्रा जैसी विद्वान महिलाओ का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद में नारी की भूमिका का महत्वपूर्ण वर्णन मिलता है। सामवेद एवं यजुर्वेद में उन वाद्ययंत्रो का चित्रण है जो मुख्य रूप से महिलाओ द्वारा बजाए जाते है तथा उन मंत्रो का वर्णन है जो महिलाओ द्वारा विशेष रूप से पढे जाते है।

हमारी संस्कृति महिलाओ को शिक्षा, वादविवाद, कौशल विकास शारीरिक सौष्ठव, युद्ध आदि सभी क्षेत्रो में महत्वपूर्ण स्थान देते हुए समाज एवं परिवार के पोषण एवं विकास की बात करता है।

उत्कृष्ट पीढियो के सृजन की शक्ति धारण का श्रेय भी भारतीय नारी को ही जाता है। सन्तानोत्पत्ति तो सभी नारिया कर सकती है किन्तु उत्कृष्ट और विषय केन्द्रित सन्तान गढने का ज्ञान भारतीय नारी के गौरव का मुख्य अंग रहा है। वर्तमान में गर्भ संस्कार का वैज्ञानिक अध्ययन इसे अक्षरशः प्रमाणित करता है।

रानी मदालसा ने अपनी इच्छानुसार अपने तीन पुत्रो को गर्भ से ही ब्रह्मऋषि तथा चौथे पुत्र को चक्रवती सम्राट बनाया। इसी प्रकार सुभद्रा ने अपने पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह तोडने की कला का शिक्षण अपने पति अर्जुन के माध्यम से गर्भ में ही दिया। इस प्रकार से उत्कृष्ट समाज का निर्माण करने हेतु भारतीय नारी एक लम्बे त्याग पूर्ण श्रेष्ठ आचरण का वरण कर अपना जीवन एवं परिवार तथा समाज को धन्य करती रही है।

प्रत्यक्ष दुर्गा और शत्रु के लिए काल के रूप में वर्णित झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का जीवन भारतीय नारी के साहस एवं शौर्य के गुण को महिमा मंडित करता है। आदर्श स्वामीभक्ति एवं त्याग का सिरमौर भी है भारतीय नारी। मॉ पन्ना की स्वामीभक्ति तथा त्याग सर्वविदित है। ऋषि दधीचि का दान तो विश्व विख्यात है किन्तु मॉ पन्ना ने भी जो समाज कल्याण एवं स्वामीभक्ति मे ंकिया वह कम नही है। उन्होने स्वयं अपने हाथो अपने कलेजे के टुकड़े अपने पुत्र को स्वामीभक्ति पर बलिदान कर दिया था।

चित्तौड़ की गद्दी पर छः वर्ष का बालक उदय सिंह बैठा था। उदय सिंह की माता की मृत्यु हो चुकी थी। अतः धाय मॉ पन्ना उसका पालन कर रही थी। उस समय दासी पुत्र बनवीर  राज्य  का संचालन कर रहा था। बनवीर के मन में लोभ आया कि वह उदय सिंह तथा उसके भाई विक्रम को मार सदा के लिए राजा बन सकता है। बनवीर ने विक्रम का वध कर दिया तथा उदय सिंह को मारने के लिए निकला। मॉ पन्ना को इसकी सूचना मिल गई थी, अतः उन्होने उदय सिंह को अपने पुत्र के स्थान पर तथा अपने पुत्र चंदन को उदय सिंह के स्थान पर सुला दिया। बनवीर ने मां पन्ना की नेत्रो के समझ चंदन को उदय सिंह समझ एक ही वार में उसका सिर काट दिया। भेद न खुल जाए अतः उस समय मॉ पन्ना ने स्वयं को पत्थर कर लिया किन्तु नेत्रो से अश्रु न गिरने दिया। बनवीर के चले जाने के बाद मॉ पन्ना उदय सिंह को लेकर दूसरे स्थान पर चली गई वहॉ उन्होने उदय सिंह का पालन पोषण किया। बडा होने पर उदय सिंह चित्तौड की गद्दी पर बैठा अवसर आने पर स्वामी भक्ति में कितना बड़ा त्याग किया जा सकता है, इसका आदर्श उपस्थित कर धाय मॉ पन्ना इतिहास में अमर हो गई।

रानीहाड़ी और राजपूत बालिका विद्युल्लता जैसी वीरांगनाए देश भक्ति में किए गए बलिदान का श्रेष्ठ उदाहरण है। रानीहाड़ी, राजस्थान के हाडा चौहान राजपूत की बेटी थी जिसका विवाह सरदार रतन सिंह चूडावत से हुआ था। विवाह को कुछ ही दिन हुए थे किन्तु सरदार रतन सिंह चुडावत को युद्ध के लिए जाना पडा। रतन सिंह आधे मन से हिचकिचाहट के साथ युद्ध के लिए तैयार हुए। अनुपम सौन्दर्य वाली रानी हाड़ी समझ गई कि वह रतन सिंह के राजपूत धर्म पालन में बाधा बन रही है। रतन सिंह ने रानी हाड़ी से ऐसा चिन्ह मांगा जिसे लेकर वह युद्ध के लिए जा सके। रानी ने स्वयं अपना सिर काट कर एक प्लेट पर रख कपड़े से ढ़क कर सेवक के हाथो रतन सिंह को भिजवा दिया, जिससे रतन सिंह को बड़ी ग्लानि हुई और वह युद्ध के लिए चले गए।

विद्युल्लता की सगाई सरदार सिंह नामक सेनापति से हुई थी। विवाह की तैयारियॉ हो रही थी कि अलाउद्दीन ने चितौड़ पर चढ़ाई कर दी। सरदार सिंह विद्युल्लता के सौन्दर्य पर मुग्ध था तथा मरना नही चाह रहा था। राजपूत सेना को हारते देख उसे लोभ हुआ कि यदि वह बादशाह से मिल जाए तो उसका जीवन भी बच जाएगा और धन भी मिलेगा। उसने यह बात विद्युल्लता से कही तो उसने सरदार सिंह को धिक्कारा और कहा कि देश द्रोही बन जीवित रहने से मरना अच्छा है किन्तु सरदार सिंह नही माना और अलाउद्दीन से मिल गया। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ जीत लिया तथा सरदार सिंह को बहुत पुरस्कार दिया सरदार सिंह संहर्ष जब विद्युल्लता के पास आया तो विद्युल्लता उसकी नीचता सहन न कर सकी और देश द्रोही को धिक्कारते हुये कटार से आत्महत्या कर ली जिससे ऐसा व्यक्ति उसका स्पर्श न कर सकें।

देवगिरि के राजा रामदेव पर जब अलाउउद्दीन ने आक्रमण किया तो अलाउद्दीन जीत न सका। हार कर वह लौट रहा था कि उसे सरदार कृष्णराव मिला जिसे सेना के सभी भेद मालूम थे अलाउद्दीन ने कृष्णराव को अपनी ओर यह प्रलोभन देकर मिला लिया कि विजयी होने पर उसे राजा बना देगा कृष्ण राव का विवाह राज कुमारी वीरमति के साथ होने वाला था। कृष्णराव को मिला कर अलाउद्दीन ने दोबारा देवगिरि पर चढाई कर दी। तब वीरमती ने छुरी भोंक कर कृष्णराव की हत्या कर दी। अन्तिम समय कृष्णराव ने कहा कि मै देश द्रोही तो था किन्तु तुम्हारा तो पति था। इस पर वीरमती ने उत्तर दिया कि मैने अभी अपने देश भक्ति का निर्वह्न किया है और अब पति भक्ति का निर्वहन भी करती हूॅ यह कहकर  वीरमती ने आत्म हत्या कर सती का आदर्श रूप उपस्थित किया। 

रानी पद्मिनी जिनका पूरा नाम पद्मावती था,वह सिंहलद्वीप के राजा की पुत्री थी जिनका विवाह राजा रतन सिंह से हुआ और वह चित्तौड़ की रानी बनी । रानी पद्मिनी सौन्दर्य की धनी थी। एक कथा के अनुसार अलाउद्दीन ने रानी पद्मिनी की सौन्दर्य गाथा सुनकर चित्तौड पर उन्हे पाने के उद्देश्य से आक्रमण किया था। राजा रतन सिंह और उनकी सेना वीरता पूर्वक लडे किन्तु खिलजी की बडी सेना के आगे न टिक सके। इसके बाद खिलजी चित्तौड के किले में प्रवेश करता और रानी एवं अन्य नारियो तक पहुॅचता इससे पहले ही रानी पद्मिनी ने हजारो क्षत्राणियो के साथ जौहर कुण्ड में कूद आत्मदाह कर अपने शील एवं गौरव की रक्षा की।

पंडित नरेन्द्र मिश्र की कविता पद्मिनी गोरा बादल का अंश भारतीय समाज में नारी के स्थान को स्वतः प्रतिबिम्बित करता है। जब राणा को खिलजी ने धोखे से कैद कर लिया और बदले में रानी पदमिनी को मांगा। रानी नाराज बैठे गोरा और बादल से मिलती है:-

‘‘राणा ने जो कहा किया वो माफ करो सेनानी,

यह कह कर गोरा के कद्मो पर झुकी पद्मिनी रानी,

यह क्या करती हो गोरा पीछे हट बोला,

और राजपूती गरिमा का फिर धधक उठा था सोला,

महारानी हो तुम सिसोदिया कुल की जगदम्बा हो,

प्राण प्रतिष्ठा एक लिंग की ज्योति अग्निगंधा हो,

जबतक गोरा के कंधे पर दुर्जय शीश रहेगा,

महाकाल से भी राणा का मस्तक नही कटेगा।’’

    मराठा साम्राज्य की प्रसिद्ध महारानी और इतिहास प्रसिद्ध सूबेदार मल्हार राव होल्कर के पुत्र खण्डेराव की धर्म पत्नी अहिल्या बाई होल्कर के शौर्य त्याग, सहानुभूति पूर्ण व्यवहार को कभी भुलाया नही जा सकता। इनका जीवन युगो तक प्रेरणा श्रोत बना रहेगा। इन वीरांगना महिलाओ का जीवन हम सभी में जिस ऊर्जा का संचार करता है उन्हे निम्न पंक्तियो के माध्यम से व्यक्त करती हूॅः-

‘‘डर के आगे जीत यादकर हर भय मै हर जाती हूॅ,

और फिर हिम्मत बांध समय मे रण चण्डी बन जाती हूॅ।

मै राधा मै दुर्गा काली लक्ष्मीबाई कहाती हूॅ,

बॉधलाल को पृष्ठ भाग मै घोटक पर चढ जाती हूॅ,

प्रेमदीप अंतस में रख कर खुद ज्वाला बन जाती हूॅ,

रक्त बीज के दमन हेतु विकराल मुखी हो जाती हूॅ,

प्रेम ज्योति सी जल कर मै जौहर की ज्वाला होती हॅॅू,

मीरा राधा सीता बन मै प्रेम निराला होती हूॅ,

प्रेममयी एक हृदय लिए मै प्रेम गीत ही गाती हूॅ,

पर यदि अवसर आ जाए तो मै कटार बन जाती हूॅ,

 और फिर निर्भय होकर मै भय हरण स्वयं हो जाती हूॅ,

समरांगण में इसी लिए मै रण चण्डी कहलाती हूॅ।’’


यहाँ कुछ कहानिया ही वर्णित की गई है। ऐसी असंख्य कहानिया है जो भारत के इतिहास में भारतीय नारी के गौरव गरिमा और महिमा का वर्णन करती है। भारत में स्त्री एवं पुरूष दोनो को ही अपने जीवन में सर्वागीण विकास के श्रेष्ठ अवसर प्राप्त थे। भारतीय नारी उत्कृष्ठ देवीय गुणो से सुशोभित होकर देश का गौरव बढाती रही है। कालान्तर में मुगलो के आक्रमण के पहले 500 वर्षो से लेकर अगले 200 वर्षो तक ब्रिटिश शासन और उपनिवेशवाद के दौरान सभी क्षेत्रो में महिलाओ की उपस्थिति बुरी तरह प्रभावित हुई।

समाज एवं परिवार में नारी के शील एवं गौरव की रक्षा के लिए पर्दा प्रथा, सती प्रथा जैसी रीतियो का जन्म हुआ। जिस देश में लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओ ने पराक्रम में देश को गौरवान्वित किया । अपाला, घोषा आदि विद्वुषी महिलाओ ने देश का गौरव बढाया , वही पर्दे के कैद खाने मे अबला कैदी की भांति नारी कराह उठी। देश को राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई किन्तु देश के लक्ष्मीबाईयो के बन्धन ढीले न हुए।

इन परिस्थितियो मंे पुनः अपने गौरवमयी इतिहास को याद कर समाज में ज्ञान ज्योति प्रज्वलित करने के उद्देश्य से उठ खडी हुई भारतीय नारी। पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा जोकि तात्कालिक स्थिति में जन्मी थी, आज कुरीति के रूप में पल्लवित हो उठी थी , इन सबके विरोध में स्वर उठाकर पुनः अपने समाज में समान शिक्षा, समान ज्ञान, समान सम्मान, समान अधिकार हेतु भारतीय नारी ने शौर्यपूर्ण संघर्ष किया और आज भी कर रही है। स्वतंत्रता युद्व में भी , तात्कालिक परिस्थितियो एवं बंदिशो के बावजूद भारतीय नारी ने भारत मॉ के चरणो में सर्वश्रेष्ठ आहूतिया दी है।

देश स्वतंत्र हो गया किन्तु अपनो के बीच कुरीति और भेदभाव के बीच उसका स्वतंत्रता युद्ध आज भी जारी है। इन  स्थितियों मंे भी हर क्षेत्र में भारतीय नारी अपनी श्रेष्ठ उपस्थिति से देश को गौरवान्वित कर रही है। वह शिक्षा, सेना, चिकित्सा, अन्तरिक्ष, समाज सेवा आदि सभी क्षेत्रो में उत्कृष्ठ प्रदर्शन कर रही हैं। इस क्रम में हम मिशन मंगलयान, मार्स ऑर्बिटिंग मिशन यानी (डव्ड)  को नही भूल सकते। 24 सितम्बर 2014 से यह स्पेसक्राफ्ट मंगल ग्रह के चक्कर लगा रहा है। मंगलयान लॉचिंग के साथ, इसरो मार्स पर पहुॅचने वाली चौथी स्पेस एजेंसी बन गई। इस प्रोजेक्ट में बाकी स्पेसक्राफ्ट  के मुकाबले बहुत कम खर्चा आया। 450 करोड़ रूपए में यह प्रोजेक्ट पूरा किया गया। इस प्रोजेक्ट में लगभग 27 प्रतिशत अहम पद महिला वैज्ञानिको ने संभाला था मुख्य 5 महिला वैज्ञानिक है मीनल संपत, अनुराधा टीके, रितू करिधल, नंदिनी हरिनाथ, मौमिता दत्ता।

   भारतीय नारी विभिन्न क्षेत्रो में बढ चढ कर प्रतिभाग भी कर रही है और अपने विरूद्ध होने वाले अमर्यादित व्यवहार का दमन करने की शक्ति भी धारित कर रही है। वह कह उठी है:-

‘‘अब धूत कोई ऑगन में मेरे फिर न खेला जाएगा,

चीरहरण का काला वह इतिहास नही दोहराएगा,

दुःशासन के हाथ मेरे केशो को न छूने पाएगे,

मर्यादा के रक्षक मेरे, मौन नही रह पाएगें,

मेरे सम्मान, के रक्षण को उन्हे धर्म सिखाया जाएगा,

मै स्त्री हूॅ इसका न अब मोल चुकाया जाएगा,

इस गलती मे मत रहना गोविन्द नही अब आएगें,

मेरे अन्तस से प्रतिपल गोविन्द मुखर हो जाएगें,

मेरे कण कण में मा शक्ति शस्त्र उठा कर दौड़ेगी,

अब कोई भी अग्निसुता न मानघात फिर सहलेगी,

अब कोई भी शकुनि की , मेरे घर में न पल पाएगा,

अब कोई भी अंधा बहरा, शासक न फिर बन पाएगा,

अब स्त्री की प्रचण्ड शक्ति का विश्व ताण्डव देखेगा,

न सुधरे तो सृजन भूल, विध्वंस की ज्वाला देखेगा,

अब धूत कोई ऑगन में मेरे फिर न खेला जाएगा,

चीरहरण का काला वह इतिहास नही दोहराएगा’’


भारतीय नारी पहले भी सशक्त रही है किन्तु इतिहास की घटनाओ से सीख समयानुकूल स्वयं में एवं समाज में परिवर्तन के लिए स्वय बुलंद करना एवं वांछित परिवर्तन प्राप्ति के लिए सज्ज होने की सामर्थ्य भी है इसमे विभिन्न धार्मिक क्षेत्रो में भी, अवैज्ञानिक एवं अन्ध विश्वास पूर्ण व्यवहार के विरूद्ध भी स्वर बुलंद कर अपना सम्मान स्थापित किया है भारतीय नारी ने।


   भारतीय नारी में निरन्तर संघर्ष कर लक्ष्य तक पहुॅचने का सामर्थ्य है। भारतीय नारी की संघर्ष ऊर्जा  मै निम्न पंक्तियो में व्यक्त करना चाहूॅगीः-


‘‘जब काल भाल के ऊपर से मै लौह शिला बन चलती हूॅ,

अंगारो के ऊपर जब मै पग पग आगे बढ़ती हूॅ,

जब जब ठोकर खा कर छल की मै धरती पर  गिरती हूॅ,

तब नए जोश से उठ उठ कर कर्त्तव्य राह मै चलती हूॅ,

मै शुद्ध हृदय कर्त्तव्य समर्पित वेद चारिणी बन पाऊ,

भारत माता के आचल में नव पुष्प पल्लवित करपाऊॅ,

सुविचार यही धारण करके मै कांटो पर भी चलती हूॅ,

मै काल भाल के ऊपर से फिर, लौह शिला सी गुजरती हूॅ,

सौ सौ कष्ट सहे मैने पर आस कभी न छोड़ सकी,

ईश्वर को प्रेम हुआ मुझसे सुविचार यही मै मान सकी,

सुखभाव लिप्त होकर शायद न उसे अकेला कर जाऊ,

इस लिए ये कष्ट भरे होगे मै विचार यही बस मान सकी,

मेरे गिरने से पहले ही आकर वो मुझको थामेगा,

कर्त्तव्य  अग्नि मे तपा तपा कर कुन्दन मुझे बनाएगा,

हृदय शत्रु का दहला दे ऐसा तूफान बनाएगा,

इस देह लता के कण कण से एक दुष्ट दमन बन जाएगा,

जब काल भाल के ऊपर से मै लौह शिला बन चलती हूॅ,

अंगारो के ऊपर जब मै पग पग आगे बढती हॅू,

जब जब ठोकर खा कर छल की मै धरती पर गिरती हूॅ,

तब नए जोश से उठ उठ कर कर्त्तव्य राह मै चलती हूॅ।’’


डाॅ कल्पना सिंह

लखनऊ

मोबाइल नम्बर 9140287722

ईमेल kalpanapgtphy@gmail.com



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