प्रेरणा काव्य- बचा लेना डॉ कल्पना सिंह के साथ स्वरचित पंक्तियाँ
क्या पता बीमारी भी मेरी
प्रेरणा बन जाए
पता नहीं कब कांटों में
गुलाब खिल जाएं
प्रेरणा काव्य- बचा लेना
डॉ कल्पना सिंह के साथ
स्वरचित पंक्तियाँ
सब खो देना चाहे जग में
तड़प बचा लेना
जीवन के झंझावातो में
कड़क बचा लेना
बुझी हुई सी चाहे लौ हो
फफक बचा लेना
अन्तिम क्षण के शौर्य सदृश
घृत तीव्र बढ़ा लेना
गम्भीर सिंधु के तल जैसा
मनसा सजा लेना
हो कैसी भी विपदा पर तुम
धैर्य बचा लेना
ऊबड़ खाबड़ पथ हो चाहे
कदम बढ़ा देना
गिरना सौ सौ बार
मगर बस स्वप्न बचा लेना
कालकूट पीकर के भी
अमृत बरसा देना
शिवोहम् की अलख जगाने
शिव तत्व जगा देना
पग के कंकड़ पत्थर को
सोपान बना लेना
छुपी हुई आशाओं से
नवदीप जला लेना
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