स्वरचित पंक्तियाँ अधिकार न मिटने दूंगी डाॅ कल्पना सिंह के साथ स्त्री शक्ति/ महिला सशक्तिकरण की व्याख्या

                                स्वरचित पंक्तियाँ

अधिकार न मिटने दूंगी

डाॅ कल्पना सिंह के साथ

स्त्री शक्ति/ महिला सशक्तिकरण की व्याख्या


क्या शक्ति मुझको सिखलाओगे

सहन शक्ति क्या बतलाओगे

स्त्री हूँ मैं मुझको क्या तुम

त्याग तपस्या सिखलाओगे


कोख से मैंने मेरी देखो

यह विराट ब्रह्माण्ड रचा है

नचिकेता, अभिमन्यु जैसे

वीरों का संसार रचा है


भांति भांति के पुष्पों से

धरती का श्रृंगार किया है

ज्ञान दीप से मैंने ही

उज्ज्वल सारा संसार किया है


स्नेह समर्पण वश मैंने

न्योछावर सब कुछ कर डाला

मेरी खुशियों पर जग ने फिर

डाका ऐसा क्यों डाला


क्षत्राणी हूँ जन्मजात

मै छुपकर वार नहीं करती

ललकारोगे मुझको तो मैं

बिलकुल बरदाश्त नहीं करती


हे सूर्य वंश के सूर्य (राम) 

तुम्हारी शपथ उठाती हूँ मैं

गर (अगर) निष्ठा से हर अपना

धर्म निभाती हूँ मैं


कैसी भी हो स्थिति

मैं मान न लुटने दूंगी

मानव होने का अपने

मैं अधिकार न मिटने दूंगी


क्षत्राणी हूँ जन्मजात

मै छुपकर वार नहीं करती

ललकारोगे मुझको तो मैं

बिलकुल बरदाश्त नहीं करती


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