प्रत्यास्थता हुक का नियम शैक्षणिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए भौतिक विज्ञान का यह टाॅपिक डाॅ कल्पना सिंह के साथ

                                    प्रत्यास्थता

हुक का नियम

शैक्षणिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए भौतिक विज्ञान का यह टाॅपिक

डाॅ कल्पना सिंह के साथ

प्रत्यास्थता -

किसी वस्तु के पदार्थ का वह गुण, जिसके द्वारा वह वस्तु वाह्य विरूपक बल के हटाए जाने पर अपने प्रारम्भिक आकार और रूप को प्राप्त कर लेता है, प्रत्यास्थता कहलाता है.

वाह्य बल लगाए जाने पर वस्तु के आकार अथवा रूप अथवा दोनों में होने वाला यह परिवर्तन, प्रत्यास्थता विरूपण कहलाता है.

प्रत्यास्थता की दृष्टि से पदार्थ का विभाजन-

1- पूर्ण प्रत्यास्थ पदार्थ- जो वस्तुएँ विरूपक बल हटा लेने पर पूर्णत: अपनी पूर्व अवस्था में लौट आती है, पूर्ण प्रत्यास्थ कहलाती है. व्यवहार में कोई भी पदार्थ पूर्ण प्रत्यास्थ नहीं होता किन्तु क्वार्ट्ज को पूर्ण प्रत्यास्थ का उदाहरण मान लेते हैं.

2- पूर्ण सुघट्य पदार्थ- जो वस्तुएँ विरूपक बल हटा लेने पर भी अपनी पूर्व अवस्था को प्राप्त नहीं करती, बल्कि सदैव के लिए विरूपित हो जाती है, पूर्ण सुघट्य कहलाती है. व्यवहार में कोई भी पदार्थ पूर्ण सुघट्य नहीं है. पुट्टी, गीली मिट्टी, मोम को आदर्श सुघट्य या पूर्ण सुघट्य मान लेते हैं.

3- अप्रत्यास्थ पदार्थ- जिन वस्तुओं पर वाह्य बल लगाने से उनका आकार और रूप नहीं बदलता, अप्रत्यास्थ कहलाती है. व्यवहार में कोई भी वस्तु पूर्णतः अप्रत्यास्थ नहीं है, किन्तु लकड़ी, कांच आदि को अप्रत्यास्थ पदार्थ मान लेते हैं.

अंतर परमाणवीय बलों के आधार पर प्रत्यास्थता

-किसी भी पदार्थ में परमाणु एक दूसरे के साथ अंतर परमाणवीय बलों के कारण ही होते हैं

- चित्र 1 में अंतर परमाणवीय ( परमाणुओं के बीच) दूरी r के साथ स्थितिज ऊर्जा U और अंतर परमाणवीय बल F का परिवर्तन दिखाया गया.

- ज्यादा अंतर परमाणवीय दूरी r>r0, के लिए स्थितिज ऊर्जा ऋणात्मक है.

- r=r0 के लिए स्थितिज ऊर्जा सबसे कम है, एवं इस स्थिति में अंतर परमाणवीय बल शून्य है, r0 संतुलन अवस्था में दो परमाणुओं के बीच की दूरी है.

- यदि परमाणुओं के बीच की दूरी r0 से कम होती है, तो स्थितिज ऊर्जा में तेज वृद्धि होती है और अंतर परमाणवीय बल आकर्षण से प्रतिकर्षण में बदल जाता है.


चित्र 1


इस प्रकार अंतर परमाणवीय बलों का व्यवहार वस्तु के रूप एवं आकार में परिवर्तन का विरोध करता है, परमाणुओं के बीच दूरी बढ़ने कर, आकर्षण बल तथा दूरी r0 से कम होने पर प्रतिकर्षण बल, वस्तु की अवस्था परिवर्तन का विरोध करता है.

स्प्रिंग बाॅल माॅडल या परमाणवीय माॅडल के आधार पर प्रत्यास्थता की व्याख्या-

ठोस में परमाणुओं को त्रिविमीय स्थान में स्प्रिंग से जुड़े हुए द्रव्यमान बिन्दु या छोटे गेंद के रूप में माना जा सकता है

स्प्रिंग का व्यवहार, अंतर परमाणवीय बलों को प्रदर्शित करता है.

सामान्य स्थिति में यह गेंदें उस स्थिति में रहेगी जहाँ स्थितिज ऊर्जा अल्पतम है और अंतर परमाणवीय बल शून्य है.

यदि कोई भी गेंद साम्यावस्था से विस्थापित होती है तो इससे जुड़े हुए स्प्रिंग इस पर बल लगाते हैं.

यह बल पुनः गेंद को साम्यावस्था में ले आते हैं.


चित्र 2



प्रत्यास्थता को समझने के लिए प्रतिबल (stress) और विकृति (strain) को समझना अनिवार्य है.

प्रतिबल (stress)- 

जब किसी वस्तु पर वाह्य बल लगा कर उसके आकार अथवा रूप में परिवर्तन किया जाता है, तब वस्तु की अनुप्रस्थ काट पर, वाह्य बल के बराबर परन्तु विपरीत दिशा में आंतरिक प्रतिक्रिया बल उत्पन्न हो जाता है, इस प्रतिक्रिया बल को प्रत्यानयन बल कहते हैं.

अनुप्रस्थ काट के एकांक क्षेत्रफल पर कार्य करने वाले प्रत्यानयन बल को प्रतिबल कहते हैं.

चूकि लगाया गया बल = आंतरिक प्रतिक्रिया बल

अत: यदि लगाया गया बल F और अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A है तो

प्रतिबल = F/A


प्रतिबल के  प्रकार-

1- तनन प्रतिबल या अनुदैर्ध्य प्रतिबल- प्रति एकांक अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल पर लगने वाला प्रत्यानयन बल, जबकि लगाए गए बल की दिशा में वस्तु की लम्बाई में वृद्धि होती है, तनन प्रतिबल या अनुदैर्ध्य प्रतिबल कहलाता है.

चित्र 3


2- संकुचन प्रतिबल- प्रति एकांक अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल पर लगने वाला प्रत्यानयन बल, जबकि लगाए गए बल की दिशा में वस्तु की लम्बाई में कमी होती है, संकुचन प्रतिबल कहलाता है.

3- द्रवस्थैतिक प्रतिबल- यदि किसी वस्तु पर सभी दिशाओं से एकसमान बल लगाया जाता है, तो संगत प्रतिबल को द्रवस्थैतिक प्रतिबल कहते हैं.

4- विरूपक प्रतिबल या स्पर्शरेखीय प्रतिबल- जब किसी पिण्ड के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के समान्तर दो बराबर और विपरीत विरूपक बल लगाए जाते हैं ( दोनों बल अलग अलग समान्तर अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल पर), तो इन विपरीत परतों के बीच सापेक्ष विस्थापन होता है. इस स्थिति में लगाए गए स्पर्शरेखीय बल के कारण,प्रत्यानयन बल प्रति एकांक क्षेत्रफल विरूपक प्रतिबल या स्पर्शरेखीय प्रतिबल कहलाता है.

चित्र 4



विकृति ( Strain) - पिण्ड पर लगने वाले विरूपक बल के कारण, इसके रूप एवं आकार में परिवर्तन होता है.

रूप या आकार में उत्पन्न परिवर्तन का उसके वास्तविक मान से अनुपात, विकृति कहलाता है.

विकृति= रूप या आकार में परिवर्तन/ रूप या आकार का वास्तविक मान.

चूंकि विकृति समान भौतिक राशियों का अनुपात है, अत: इसका कोई मात्रक या विमा नहीं होगा.

विकृति के प्रकार

1- अनुदैर्ध्य विकृति ( longitudinal strain) - यदि किसी वस्तु की लम्बाई के अनुदिश उस पर बल लगाया जाता है, तो उसकी लम्बाई में वृद्धि हो जाती है. लम्बाई में वृद्धि प्रति एकांक प्रारम्भिक लम्बाई, अनुदैर्ध्य विकृति कहलाती है. चित्र 3 के अनुसार.

अनुदैर्ध्य विकृति = लम्बाई में वृद्धि/ प्रारम्भिक लम्बाई


2- आयतन विकृति (Volume Strain) - किसी वस्तु पर विरूपक बल लगाने पर उसके एकांक आयतन में होने वाले परिवर्तन को आयतन विकृति कहते हैं.

आयतन विकृति = आयतन में परिवर्तन/ प्रारम्भिक आयतन= ΔV/V

3- अपरूपण विकृति (Shearing Strain) -किसी वस्तु के पृष्ठ पर लगाए गए स्पर्शरेखीय बल के कारण दो विपरीत पृष्ठों के बीच सापेक्ष विस्थापन चित्र 4 के अनुसार Δ X  हो जाता है. जिससे वस्तु का रूप बदल जाता है. यह अपरूपण विकृति कहलाती है.

अपरूपण विकृति =  Δ X/L = tan ϴ

जहाँ L बेलन की लम्बाई है.

प्रत्यास्थता की सीमा- प्रतिबल का वह अधिकतम मान जहाँ तक विरूपक बल हटाने पर वस्तु अपनी प्रारम्भिक आकृति एवं आकार प्राप्त कर लेता है, प्रत्यास्थता की सीमा कहलाता है. 

या

प्रत्यास्थ वस्तुएँ , विरूपक बल हटा लेने पर पूर्णतः अपनी पूर्व अवस्था प्राप्त कर लेती है. किन्तु यह एक निश्चित सीमा तक ही होता है. विरूपक बल का मान धीरे धीरे बढ़ाते जाने पर  वह अवस्था आती है जब विरूपक बल हटाने पर भी वस्तु अपनी प्रारम्भिक अवस्था को प्राप्त नहीं करती, अपितु सदैव के लिए विरूपित हो जाती है, अर्थात उनका प्रत्यास्थता का गुण नष्ट हो जाता है, विरूपक बल की यह सीमा, जहाँ तक प्रत्यास्थता का गुण विद्यमान रहता है, प्रत्यास्थता की सीमा कहलाती है.

हुक का नियम-

प्रत्यास्थता की सीमा के अन्दर प्रतिबल (stress) सदैव विकृति (strain) के अनुक्रमानुपाती होता है

प्रतिबल ∝  विकृति

अत:  प्रतिबल =नियतांक E x विकृति

अत:  नियतांक E = प्रतिबल/ विकृति

नियतांक E , प्रत्यास्थता गुणांक कहलाता है.


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