मेरी जिजीविषा स्वरचित पंक्तियाँ डॉ कल्पना सिंह द्वारा

                                                                    मेरी जिजीविषा

स्वरचित पंक्तियाँ

डॉ कल्पना सिंह द्वारा


मैं सृजन का बीज हूँ वह, जो धरा के बीच दब कर

है निरंतर सोचता, एक दिन मुझे अवसर मिलेगा

बादलों से जब उतर कर, नीर की एक बूंद अनुपम

जब भिगाएगी धरा को, वृक्ष मै उस दिन बनूंगा


बढ़ के यदि कोई काट देगा गगनचुम्बी शाख मेरी

ऊंचे गगन के भाल को छूने से मुझको रोक देगा

मै मेरी बाहों को धरती पर बढ़ा दूंगा निरंतर

भर कर धरा को अंक में आनंद से मै झूम लूंगा


घोलो निरर्थक विष भले तुम मै तनिक विचलित न हूँ गा

प्रेम का सिंधु हूँ मैं, बस प्रेम की वर्षा करूँगा

काट दो शाखाएँ चाहे, तुम जड़ों को काट डालो

सिर्फ देना जानता हूँ, मै तुम्हें देता रहूँ गा


मिट भी जाऊँ मैं अगर तेरे कुठाराघात से

एक एक फल फूल चुनना तुम मेरी शाखाओं से

खा कर मीठा फल हमारा, तुम खुशी में झूम लेना

खुश रहो प्रति दिन तुम्हे आशीष मै देता रहूँ गा


उन फलों के बीच से मै बीज बनकर फिर निकल कर

जा धरा की गोद में कुछ दिन का मै विश्राम लूंगा

बादलों से जब उतर कर, नीर की एक बूंद अनुपम

जब भिगाएगी धरा को, वृक्ष मै उस दिन बनूंगा


रचनाकार डाॅ कल्पना सिंह


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