स्नेह हमारा स्वरचित पंक्तियाँ डॉ कल्पना सिंह के साथ

                                    स्नेह हमारा

स्वरचित पंक्तियाँ

डॉ कल्पना सिंह के साथ



क्यों आंखे मूंद लेते हो

निगाहें फेर लेते हो

हमें मिलने की चाहत है

क्यों बंधन तोड़ लेते हो

निगाहें द्वार पर रख कर

हृदय में प्यार को भर कर

कि मिलने आओगे एक दिन

यही सोचा किए हर पल

जहाँ में देख लेना जी

कहीं भी ढूंढ लेना जी

नहीं पाओगे हम जैसा

यही महसूस होगा जी

हमारा प्रेम है ऐसा

सुखद मकरंद के जैसा

कि सौरभ मुझसे आया है

तेरा जीवन सुमन जैसा


रचना कार - डॉ कल्पना सिंह

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