भारत ने स्वतंत्रता के लिए चुकाई थी बड़ी कीमत इसे ध्यान में रखना अनिवार्य इस श्रृंखला में नीरा आर्य के अविस्मरणीय शौर्य और बलिदान पर चर्चा डाॅ कल्पना सिंह के साथ

            भारत ने स्वतंत्रता के लिए चुकाई थी बड़ी कीमत

इसे ध्यान में रखना अनिवार्य

इस श्रृंखला में नीरा आर्य के अविस्मरणीय शौर्य और बलिदान पर चर्चा डाॅ कल्पना सिंह के साथ


हम भारतीय आज हिन्दुस्तान की धरती पर पूर्ण स्वतंत्रता से जिस हर्षोल्लास का जीवन जी रहे हैं, उसके पीछे हमारे वीर बन्धुओं और वीरांगना भगिनियो का महा बलिदान भुलाया नहीं जा सकता.

इन बलिदानों में कुछ नाम तो हमें आज याद है, कुछ कम सुनें गए और कुछ तो अज्ञात बलिदानियों के भी है. किंतु इनमें से किसी का भी बलिदान कमतर नहीं.

इन्हीं कम सुने गए नामो में से एक है नीरा आर्य. 

आज हम नीरा आर्य की आत्मकथा के आधार पर इनसे जुड़ी घटना पर बात कर इनके बलिदान को श्रद्धांजलि देने के साथ आजादी की कीमत को याद कर दृढ़ संकल्प लेंगे कि इस बलिदान को हम व्यर्थ नही जाने देंगे.

नीरा आर्य का जन्म 5 मार्च 1902 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के खेकड़ा नगर में हुआ था, जो अब भारत के बागपत जिले में है. नीरा आर्य के सम्बन्ध में यह जानकारी मिलती है कि इनकी शिक्षा का प्रबंध इनके धर्म पिता सेठ छज्जूमल द्वारा किया गया था, जो अपने समय के प्रतिष्ठित व्यापारी थे और इनका व्यापार पूरे भारत में फैला था, किन्तु कलकत्ता व्यापार का मुख्य केन्द्र था. सेठ छज्जूमल ने नीरा की प्रारंभिक शिक्षा का प्रबंध कलकत्ता के पास भगवान पुर ग्राम में किया और बाद की शिक्षा कलकत्ता शहर में हुई.

नीरा आर्य हिन्दी, अंग्रेजी, बंगाली भाषाओं के साथ साथ अन्य कई भाषाओं में प्रवीण थी.

इनका विवाह ब्रिटिश भारत में सी आई डी इंस्पेक्टर श्रीकांत जय रंजन दास से किया गया था. श्रीकांत जय रंजन दास एक अंग्रेज भक्त अधिकारी था, जिसे नेता जी सुभाष चंद्र बोस की जासूसी करने और उन्हें मार देने का उत्तरदायित्व अंग्रेजों द्वारा दिया गया था.

एक बार अवसर पा कर श्रीकांत जय रंजन दास ने नेता जी सुभाषचंद्र बोस पर, उन्हें मारने के उद्देश्य से गोलियां दागी, वह गोलियां नेता जी के ड्राइवर को जा लगी, इसी बीच नीरा आर्य ने श्रीकांत जय रंजन दास के पेट में संगीन (चाकू) घोंप कर उसे मृत्यु की नीद में सुला दिया. यह एक बड़ा बलिदान था नीरा आर्य का, जब उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख से ऊपर अपने देश को रखा . हम सभी को इसी मानसिकता से हर समय कार्य करना होगा.

नीरा आर्य के साथ साथ इनके भाई बसंत कुमार भी महान स्वतंत्रता सेनानी थे.

नीरा आर्य ने आजाद हिन्द फौज के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए थे. इन्हें आजाद हिंद फौज का प्रथम जासूस होने का गौरव प्राप्त है. इन्हें यह जिम्मेदारी स्वयं सुभाष चंद्र बोस ने दी थी. इन्होंने मानती आर्या, सरस्वती राजा मणि, दुर्गा मल्ल गोरखा आदि साथियों के साथ आजाद हिंद फौज और नेता जी के लिए अंग्रेजों की जासूसी की थी.

नीरा आर्य की आत्मा कथा के आधार पर मै यहाँ दो और घटनाओं का वर्णन करना चाहूँ गी, जिनको सुनने मात्र से व्यक्ति थर्रा उठता है, हृदय वेदना से भर जाता है किन्तु भारत की बेटियों के शौर्य से शीष गर्व से उठ जाता है.

प्रथम घटना 

नीरा आर्य और सरस्वती राजा मणि को अंग्रेज अधिकारियों के जासूसी का काम सौंपा गया था. सरस्वती राजा मणि, नीरा से छोटी थी और बर्मा की रहने वाली थी. दोनों ने लड़कों की वेशभूषा अपनाकर अंग्रेज अधिकारियों के घरों और मिलिट्री कैम्पों में काम करना आरम्भ किया. इनका काम था हर समय सजग रहना, और प्राप्त जानकारियों को अपने साथियों के साथ चर्चा करके, नेता जी तक पहुंचाना. जासूसी पर भेजते समय इन सभी लड़कियों को साफ साफ बताया गया था कि पकड़े जाने पर इन्हें स्वयं को गोली मार लेनी है. एक लड़की ऐसा करने से चूक गई और जीवित पकड़ी गई. इससे इनके सभी साथियों और संगठन पर खतरा छा गया. तब नीरा आर्य और सरस्वती राजा मणि ने अपनी उस पकड़ी गई साथी को छुड़ा लाने का फैसला किया.

दोनों हिजड़े नर्तकी की वेशभूषा में उस जगह पहुची जहाँ उनकी साथी दुर्गा को बंदी बना कर रखा गया था. उन्होंने अफसरों को नशीली दवा खिलाई और साथी दुर्गा को ले भागी. किन्तु भागते समय, पहरे पर लगे सिपाहियों में से किसी एक के बन्दूक की गोली सरस्वती राजा मणि की दांयी टांग में लगी , किसी तरह लड़खड़ाते हुए राजा मणि, नीरा और दुर्गा के साथ ऊंचे पेड़ पर चढ़ गयी. नीचे सर्च आॅपरेशन चलता रहा इस कारण तीनों को भूखे प्यासे तीन दिन तक उसी पेड़ पर बैठे रहना पड़ा. तीन दिन बाद तीनों सकुशल आजाद हिन्द फौज के बेस कैंप लौट गयी. किन्तु तीन दिन तक टांग में गोली धंसी रहने के कारण सरस्वती राजा मणि को उम्र भर के लिए लंगड़ाहट मिल गयी.

द्वितीय घटना

आजाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद नीरा आर्य को इनके पति की हत्या के आरोप में काले पानी की सजा दी गई, जहाँ उन्हें घोर यातनाएं दी गयी.

नीरा आर्य की आत्मकथा के अनुसार इन्हें गिरफ्तार कर पहले कलकत्ता जेल भेजा गया. वहाँ एक ऐसी घटना का वर्णन नीरा आर्य ने किया है, जिसे पढ़ कर या सुन कर ही व्यक्ति सिहर जाता है, हृदय करुणा से भर जाता है, या यूँ कहे कि जिसे हम सुनना भी नहीं चाहते वह उन्होंने सहन किया है, इस लिए मै उसी रूप में घटना आप तक पहुंचाने का प्रयास करूगीं.

कलकत्ता जेल में उनके रहने का स्थान वही छोटी कोठरियां थी जहाँ अन्य महिला राजनैतिक बंदियों को रखा गया था. जिनमें चटाई, कम्बल आदि कोई भी व्यवस्था के बिना रात के दस बजे उन्हें बंद कर दिया गया. किन्तु उस समय नीरा आर्य को यह चिंता थी कि जहाँ उन्हें भेजा जा रहा है (काला पानी) वहाँ गहरे समुद्र के बीच अज्ञात द्वीप में रहते हुए स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, इन सब के चलते उन्होंने ओढ़ने बिछाने से अपना ध्यान हटाया और जमीन पर ही लेट गई. और नीद भी आ गयी. लेकिन तभी लगभग 12 बजे, एक पहरेदार आया और दो कम्बल ऊपर फेंक गया, जिससे अचानक नींद टूट गई, जिसका बुरा तो बहुत लगा किन्तु कम्बल मिलने का संतोष भी हुआ, उस समय भी लोहे की बेड़ियों का कष्ट तो था ही, साथ ही भारत माता को छोड़कर जाने की वेदना भी थी. सुबह हुई, सूरज निकलते ही उन्हें खिचड़ी दी गई, तभी लुहार भी आ गया बेड़ियाँ काटने के लिए. उसने हाथ की बेड़ियाँ काटना शुरू किया और काटने के साथ ही हाथ का थोड़ा चमड़ा भी काट दिया. और नीरा आर्य लिखती है कि पैरों से आड़ी बेड़ियाँ काटते समय लुहार ने केवल दो तीन बार हथौड़े से पैरों की हड्डी को जांचा कि कितनी पुष्ट है.

दुखी होकर नीरा ने कहा " क्या अंधा है, जो पैर में मारता है? " इस पर लुहार ने तुरंत पलट जवाब दिया था, " पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी". इस पर नीरा ने कहा कि बंधन में हूँ तुम्हारे क्या कर सकती हूँ और गुस्से से नीरा आर्य ने थूक दिया था उस पर और कहा था कि औरतों की इज्जत करना सीखे. इस पर वहाँ खड़े जेलर ने कड़क आवाज में कहा था, " तुम्हे छोड़ दिया जाएगा, यदि तुम बता दोगी, तुम्हारे नेता जी सुभाष कहाँ है. नीरा ने जेलर को उत्तर दिया कि सारी दुनिया जानती है, नेता जी हवाई दुर्घटना में चल बसे. इस पर जेलर बोला, " नेता जी जिन्दा है, तुम झूठ बोलती हो कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए "

नीरा आर्य बोल पड़ी " हाँ नेता जी जिन्दा है "

" तो कहाँ है" जेलर ने पूछा.

नीरा ने कहा, " मेरे दिल में जिन्दा है वे"

यह सुनते ही जेलर आग बबूला हो गया, और बोला, " तो तुम्हारे दिल से हम नेता जी को निकाल देंगे " . यह कहते ही जेलर ने नीरा आर्य के आंचल पर हाथ डाल दिया, और उसके छाती को ढकने वाले कपड़े फाड़ दिए. फिर लुहार की ओर संकेत किया. लुहार ने बड़ा सा औजार उठा लिया, जो कुछ उस कैंची की तरह था जिससे बाग बगीचे मे बढ़ी हुई पत्तियाँ और टहनियाँ काटते हैं, उस औजार को ब्रेस्ट रिपर कहते थे. वह लुहार इस औजार से नीरा के दाएं स्तन को दबा कर काटने लगा. औजार में धार नहीं था, किन्तु इसमें नीरा के स्तन को दबा कर असहनीय पीड़ा दी गई, साथ ही दूसरी तरफ से जेलर ने नीरा की गर्दन पकड़ कर कहा, " अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये दोनों गुब्बारे छाती से अलग कर दिए जाएगे " . यह कृत्य और उस पर ऐसी घिनौनी भाषा को सहन करना कितना कष्टकारी रहा होगा, सभी समझ सकते हैं. इसके बाद भी जेलर ने एक चिमटे जैसा हथियार नीरा की नाक पर मार दिया और बोला, " शुक्र मानो हमारी महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग में नहीं तमाशा , आग से तमाशा होता तो तुम्हारे दोनों स्तन पूरी तरह उखड़ जाते" . 

देश की बेटियों ने ऐसी प्रताड़ना का सामना किया है तब हमे यह आजादी मिली है.

स्वतंत्र भारत में नीरा आर्य और उनके जीवन का अंतिम समय

स्वतंत्र भारत में अपने जीवन के अंतिम दिनों को, इन्ही नीरा आर्य ने संघर्ष के साथ बिताया. नीरा आर्य ने फूल बेच कर गुजारा किया किन्तु कभी भी कोई सरकारी सहायता स्वीकार नहीं की. इनकी झोपड़ी जो कि सरकारी जमीन पर बनी थी, इस कारण जीवन के अन्तिम समय में उसे भी तोड़ दिया गया था. गरीब, असहाय, बीमार, वृद्ध नीरा आर्य की मृत्यु हैदराबाद में चारमीनार के पास ही उस्मानिया अस्पताल में 26 जुलाई 1998 को हुई. स्वतंत्र वार्ता हिन्दी दैनिक के पत्रकार तेज पाल सिंह धामा और उनके साथियों ने मिलकर कर नीरा आर्य का अंतिम संस्कार किया. इस तरह आजाद हिन्द फौज के महिला विंग , रानी लक्ष्मीबाई रेजिमेंट की सिपाही ने दुनिया से विदा लिया.

देश की आज़ादी के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले स्वतंत्रता सेनानी के प्रति और देश के प्रति अपना दायित्व हमें समझना चाहिए, अन्यथा उन महान बलिदानियों के ऋण से हम सम्भवतः  कभी मुक्त न हो पाएंगे.





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