बेटी तू मेरा बेटा है स्वरचित पंक्तियाँ डॉ कल्पना सिंह के साथ, महिला समानता दिवस पर विशेष
बेटी तू मेरा बेटा है
स्वरचित पंक्तियाँ
डॉ कल्पना सिंह के साथ
26 अगस्त, हम महिला समानता दिवस मना रहे हैं, पर आज भी जब बात महिला को घर और समाज में समान अधिकार, समान सम्मान समान स्थान देने की आती है तो कितने ही प्रश्न उठता खड़े होते हैं.
कुछ लोग तो समानता के नाम पर बड़ी बेतुकी बातें करने लगते है, वे महिला पुरुष की शारीरिक संरचना में भिन्नता और सामाजिक आवश्यकता को भूल कर, परिश्रम आदि का राग अलापने लगते, भूल जाते हैं वे कि उनके स्वयं के अस्तित्व के पीछे किसी महिला का कितना बड़ा त्याग है. त्याग उस महिला के सपनों का, कैरियर प्रगति का, स्वास्थ्य का, नींद का. इन सबके बाद भी यह समाज उसे वह सम्मान नहीं देता, परिवार और समाज आज भी कहीं न कहीं उसके विचार और सलाह को उचित मान नहीं देता. रस्मों और परम्पराओं के नाम पर महिलाओं पर ही नियम थोपे जाते है.
इस विषय पर तो लम्बी चर्चा हो सकती है, इस लिए इसे विराम देते हुए समर्पित है विषय आधारित यह पंक्तियाँ.
बेटी को समता देने को, तुझे बड़ा जिगर करना होगा
छोड़ रास्ते बने हुए तुझे राह नयी गढ़ना होगा
क्या कहते हो घर पर तुमने बेटी को सम्मान दिया
जितना प्यार किया बेटे को, बेटी को भी लाड़ दिया
या फिर बेटी के साए में, हर दम तुम कुछ खोज रहे थे
बेटी को ही बेटा कह कर जब जब तुम कुछ बोल रहे थे
माना तुमने बेटी को भी जीने का अधिकार दिया है
भ्रूण रूप में हत्या को गन्दा कह कर त्याग दिया है
पर बेटी को बेटा कहकर क्या सच में सम्मान दिया है
तोल तराजू में दोनों को बेटी को धिक्कार दिया है
पूछूँ मै एक बात मुझे सच्चाई से ही बतलाना
भाया है क्या बेटे को, बेटी तुमको कहलाना
और छोड़िये, क्या समाज की सोच बदल पाए हो
सांसो के संग जीने का हक़ क्या उसको दे पाए हो
कितने कदम बढ़े हो अब तक, कितना खुद को बदला है
किसी निर्भया को क्या बोला, उसका आंचल उजला है
एक शरीर में बंध कर तुमने मानवता को मार दिया
बेटी को न अब तक तुमने जीने का अधिकार दिया
शादी की रस्मों ने भी उससे एक मजाक किया
चूड़ी कंगन साड़ी की जंजीरों में बांध दिया
बड़े जतन से देखो तुमने कितना समय बदल डाला
बड़ा हृदय कर बेटी को आजादी इतनी दे डाला
दो दो चूड़ी पहना हाथ में, मांग जरा सी भर लेना
कभी कभी साड़ी पहनो चाहे पल्लू सिर पर मत लेना
बड़े बुजुर्गों के आगे सिर को थोड़ा ढक लेना
धीरे से बस मुसकाना, बात जोर से मत करना
इच्छा होती बेटी की यह तब तो बात समझ आती
पर जीवन है बेटी का लिखी हुई कोई कहानी
लेखक बन कोई और लेख जो लिखता जाता
बेटी का जीवन क्यों उस पर चलता जाता
बेटे को जब हर बंधन से मुक्त किया है
फिर क्यों बेटी को बंधन में बांध दिया है
कठिन डगर पर बेटी ही है जो पल पल बढ़ती जाती
फिर क्यों उसको बेटा कह कर दुनिया नीचा दिखलाती
कविता में प्रयुक्त निर्भया शब्द से सभी भलीभाँति परिचित होगे. जो कि बलात्कार जैसी दर्दनाक घटना की शिकार बेटी के लिए प्रयोग हुआ था, जिस घटना के विरोध में पूरा हिन्दुस्तान उठ खड़ा हुआ था.
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Good one
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