प्रेरणा
प्रेरणा
सत्य घटनाओं पर आधारित एक प्रेरक कहानी
जुलाई का महीना है, तेज बरसात हो रही है, गर्मी में भी ठण्डी का आभास हो रहा है, रामशरण के घर की छत से उसकी गरीबी पानी के रूप में टप टप टपक रही है, इन सब के बीच रामशरण के जीवन में एक नई आस जन्म ले रही है, रामशरण की पत्नी उर्मिला गर्भवती है और सन्तान बस जन्म लेने ही वाली है,
रामशरण की प्रतीक्षा में खुशी और घबराहट दोनों रह रह कर दिखाई दे रहे है, कभी यह सोच कर वह खुश हो रहा है कि एक बेटे का जन्म होगा जो कुछ ही समय में उसका सहारा बन कर सौभाग्य का सूर्य उदित करेगा, तो कभी घबराता कि कहीं बेटी हुई तो इस गरीबी में जहाँ रोटी जुटाना कठिन है, बेटी का बोझ कैसे उठाएगा, प्रतीक्षा की घड़ियाँ सदियों सी लग रही है, तभी प्रतीक्षा समाप्त होती है, भीतर से एक स्त्री ने आकर सूचना दी, रामशरण के ऊपर पहाड़ टूट पडा़, वह बुत सा खड़ा रह गया, पर वास्तव मे जितना उसने सोचा था, स्थिति उससे कहीं अधिक भयावह लग रही थी, सूचना उसके कानो में गूंज रही थी, ' बिटिया भयी है लेकिन एक समस्या है, ओके एक ही पांव है'
रामशरण और उर्मिला के आंसू नहीं रुक रहे थे, रह रह कर दोनों भाग्य को कोस रहे थे, फिर दोनों ने मिलकर अपने जीवन का एक बड़ा लेकिन बहुत घिनौना निर्णय लेते है, और उस दिशा में तैयारी के लिए रामशरण घर से निकल गया.
कुछ देर बाद रामशरण लौट कर आता है, और राहत की सांस ली, जैसे किसी बड़ी समस्या से छुटकारा मिल गया हो, उर्मिला के पास से बेटी को उठाया, माँ का ह्दय आंसू नही रोक सका, तो रामशरण ने उर्मिला को समझाया ' देख उर्मि रो मत, इस लड़की का बोझ हम नहीं उठा पाएगें, हमारे ही दिन जैसे तैसे कट रहे है, और फिर यह एक लड़की वो भी एक पांव की, जो खुद अपनी जिन्दगी न जी पाएगी, हमारी क्या मदद करेगी, हमारे साथ रखेंगे तो क्या ही जीवन होगा इसका, जहाँ दे रहे हैं इसे जैसा भी हो रोटी तो खाएगी दो जून की, हाँ वो जगह अच्छी नही है, नाचने गाने का धन्धा करवाते हैं लड़कियों से, पर अभी से वहाँ रहेगी तो सब सीख जाएगी, और यहाँ किसी को बताएगे ही नहीं,बोल देगे की मर गई, अपनी इज्जत रही भी कोई दाग न आएगा और फिर हमें भी पांच हजार देकर जा रहे हैं, भूल जा इस लड़की को, पांच हजार से हम कुछ काम कर लेगे, जिससे इसके आगे होने वाले भाई बहन का जीवन संवार सके, समझ ले कि अपने भाई बहनों के लिए यह बलिदान कर रही है, इस स्थिति में इससे अच्छा कुछ हो नही सकता' यह कह कर बेटी को गोद मे लेकर वह चला, पर दरवाजे पर पड़ोस की कौशल्या ने उसे रोक लिया, कौशल्या ने रामशरण की सारी बात सुन ली थी, उसने रामशरण को समझाने का बहुत प्रयास किया, पर वह नही माना, कौशल्या पड़ोस की एक गरीब विधवा है, जो स्त्री (iron) का काम कर अपना खर्च चलाती है,
कौशल्या ने कहा कि ठीक है यह बेटी मुझे देदो मै पाल लूंगी, इसे लेकर यहाँ से दूर चली जाउंगी, हाँ पांच हजार नहीं दे पाऊंगी तुम्हे, इतना तो कर सकते हो इस बेटी के लिए, समझाने पर रामशरण मान गया, कौशल्या बेटी को लेकर दूसरी जगह चली गयी.
दूसरों के घरों में झाड़ू पोछा का काम करके कौशल्या अपनी बेटी की तरह उसे पालने लगी, उसका नाम रखा चैतन्या.
चैतन्या बड़ी हो रही थी, पास के सरकारी स्कूल में पढ़ने भी जाने लगी, ऐसी होनहार बच्ची की सभी उसे स्नेह देते, कौशल्या को माॅं बुलाती, सभी उसे कौशल्या की बेटी समझते, कक्षा में भी अव्वल रहती, धीरे धीरे समय बीत रहा था, कौशल्या ने उसे अच्छे संस्कार के साथ पाला, इस लिए सबकी लाडली थी.
चैतन्या कुछ 12-13 वर्ष की थी, कौशल्या ने निश्चित किया उसके जीवन का सच उसे बता देने की, क्योंकि उस सच को वह चैतन्या के लिए साश्वत प्रेरणा बनाना चाहती थी, उसकी इच्छा थी कि चैतन्या एक ऐसा उदाहरण बने कि फिर कोई भी अपनी मनुष्यता खो कर किसी के साथ वह न करे जो चैतन्या के साथ हुआ, कौशल्या जानती थी कि उसकी परवरिश ने चैतन्या को इतना सशक्त बनाया है कि इस सच से वह टूटेगी नही बल्कि और सशक्त हो कर निकलेगी, और ऐसा ही हुआ,
चैतन्या के हृदय में कौशल्या के लिए प्रेम और सम्मान और अधिक बढ़ गया, अपने कर्तव्य के प्रति वह और अधिक निष्ठावान हो गई, उसके गुणों की खुशबू चारों ओर फैल रही थी, पर अब भाग्य को क्या मंजूर था, कौशल्या का स्वास्थ्य दिन ब दिन गिरता जा रहा था, अब तो काम पर जाना भी सम्भव नही हो रहा था, चैतन्या की दसवीं की परीक्षा समाप्त हो गई थी, घर का खर्च चल सके इस लिए माँ की जगह वह काम पर जाने लगी.
एक बार फिर चैतन्या के जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, कौशल्या को कैंसर हो गया था, माँ के देखभाल और घर चलाने के लिए चैतन्या को अब काम करना ही था, चैतन्या ने पढ़ाई छोड़ कर काम करने का निश्चय किया, उसका एक ही पैर था,फिर भी ज्यादातर लोगों ने उसे काम पर रखा जिससे उसकी सहायता हो सके.
अंजली खुराना के घर काम करते करते चैतन्या कुछ गा रही थी, उसे सुन कर अंजली हैरान रह गई, उन्होंने चैतन्या से पूछा कि इतना अच्छा गाना कहा से सीखा, चैतन्या ने बताया कि बचपन में माँ के साथ अंजली के घर आती थी और जब अंजली छात्राओं को संगीत सिखाती तो वह भी सुनती फिर सबकी नकल करती, जिससे वह अच्छा गाने लगी, इसी कारण स्कूल की संगीत शिक्षिका ने उस पर ज्यादा ध्यान दिया.
इसके बाद अंजली उसे नियमित संगीत सिखाने लगी, चैतन्या काम के साथ संगीत साधना मे लग गई, अंजली उसकी हर तरह से सहायता करती, क्योंकि वह भी एक होनहार बच्ची को हारने नहीं देना चाहती थी,
चैतन्या ने दिन रात एक कर दिया, वह जब भी जीवन में थकने लगती, अपने जन्म से जुड़े सच को याद करती और फिर आगे बढ़ती, कौशल्या के दिए संस्कार थे, जिस कारण सभी चैतन्या से स्नेह करते थे.
तभी एक दिन कौशल्या कैंसर से हार गई, और चैतन्या अकेले रह गई. पर चैतन्या के साथ वह प्रेरणा थी जो कौशल्या ने उसे दिया था. उसके जीवन का सबसे कड़वा सच उसकी शक्ति बन गया.
अपने अथक परिश्रम और अंजली के सहयोग से चैतन्या ने एक रियलिटी शो जीत लिया, और उसके बाद उसने जीवन में कभी पीछे मुड़कर नही देखा.
चैतन्या संगीत जगत का एक जाना पहचाना सितारा बन गई, माँ कौशल्या की याद में उसने बड़ा कैंसर का अस्पताल बनाया, जिससे गरीब कैंसर रोगी की सहायता हो सके, इस तरह उसे माँ कौशल्या के सेवा का सुख मिलता, जिसे अभावों के कारण अच्छा इलाज नही मिल सका था.
माँ कौशल्या के संस्कार और इच्छा के कारण उसने अपने जन्म देने वाले माता पिता को खोज निकाला, उसे पता चला कि उसके बाद उसके दो भाई और एक छोटी बहन भी है, किन्तु तीनो अपने जीवन मे व्यस्त है, संस्कार और प्रेरणा का अभाव है जो वह माता पिता का खर्च उठाने को तैयार नहीं, इस लिए चैतन्या उन दोनों को अपने साथ ले आई, अब वह साथ में रहते हैं किन्तु मन ही मन अपने किए का प्रायश्चित करते है, और चैतन्या सदैव कौशल्या की ही बेटी रही.
आखिर आज वह जो भी है उसका कारण चैतन्या के परिश्रम के साथ कौशल्या का प्रयास, संस्कार और प्रेरणा ही तो है.
शिक्षा- अपने जीवन में प्रेरणा का स्रोत सदैव बनाए रखे, अच्छे संस्कार, धैर्य और अथक परिश्रम से जीवन में सौभाग्य अवश्य उदित होता है.
लेखिका - डाॅ कल्पना सिंह

Nice
जवाब देंहटाएंWelcome
जवाब देंहटाएंMost important
जवाब देंहटाएंMost welcome
जवाब देंहटाएंGood so
जवाब देंहटाएंJi ok
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