सफलता की दिशा में आगे बढ़ना

 

डॉ कल्पना सिंह



पुरानी बातों को भूल कर 

दृढ़ इच्छा शक्ति एवं आत्मविश्वास के साथ

सफलता की दिशा में आगे बढ़ना

जो किसी बात से परेशान हैं या जो अवसाद ग्रस्त है, उसे उपरोक्त पंक्ति पढ़ कर ऐसा लगता है कि क्या यह सम्भव है। थोड़ा सा धैर्य और निरंतर अभ्यास, आप के जीवन में, आप के व्यवहार में चमत्कारिक परिवर्तन लाकर आपको एक सुखी, समृद्ध जीवन का उपहार दे जाते हैं।

यहां हम बिन्दुवार उन उपायों पर चर्चा कर रहे हैं जिन्हें अपना कर हम यह चमत्कारिक परिवर्तन ला सकते हैं।

  • यदि आप किसी बात को भूल नहीं पा रहे, एक ही बात में उलझे हैं, परेशान हैं, ऐसा बार-बार होता है, तो यह दर्शाता है कि किसी कारण वश मानसिक शक्ति कमजोर हो रही है।
  • ऐसे में मानसिक शक्ति को प्रबल करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
  • इसके लिए योगासन एवं प्राणायामअचूक उपाय है।
  • हो सकता है कि परेशान व्यक्ति को योगासन एवं प्राणायाम में स्थिर होने में भी असहजता हो, किन्तु यह सोंचकर निरंतरलगे रहना है कि सुन्दर भविष्य लिखने का यह ही एक माध्यम है।
  • यदि किसी दुखद एवं परेशानी पूर्ण वातावरण में आप है, तो स्वयम को तुरंत वहाँ से हटाने का प्रयास करे
  • आप जितनी देर तक इस तनाव पूर्ण वातावरण में रहेगे , स्र्टेस हार्मोन्याय जैसे कार्लिस्ले, एड्रेनलाइन का स्रावण बढ़ जाता है, जिससे आप अवसाद के कुचक्र में फंस जाते है, आप का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित होता है इस समय आवश्यकता है हैप्पी हार्मोन्स को बढाने की कौन से है हैप्पी हार्मोन्स और कैसे बढाएं।

·        डोपामाइन- इस हैप्पी हार्मोन को बूस्ट करने के लिए मन पसन्द काम करिए, छोटेछोटे लक्ष्य निर्धारित कर उन्हें पूर्ण करें।डोपामाइन को रिवार्ड केमिकल भी कहते हैं,इसका स्रावण तब होता है जब मस्तिष्क को यह संकेत मिलता है कि आप ने कोई कार्य किया है जो पुरस्कृत किए जाने योग्य है। आप को मन पसंद कार्यों के लक्ष्य लेकर, उन्हें पूर्ण कर, डोपामाइन के रूप में स्वयम को पुरस्कृत करना है।

·        एंडोर्फिन- यह शारीरिक और मानसिक कष्ट को दूर करने वाला हार्मोन है। व्यायाम करके, खुशनुमा माहौल में रह कर, हंस कर इसे बूस्ट कर सकते हैं।

·        सेरोटोनिन- यह हार्मोन हमारे चित्त (mood) को संरक्षित कर , हमें सुखद अनुभव कराता है। इसे बूस्ट करने के लिए प्राकृतिक वातावरण में रह कर मेडिटेशन और एक्सरसाइज करना चाहिए।

·        आॅक्सिटोसिन- यह लव हार्मोन भी कहलाता है।स्नेहशील व्यक्ति के साथ समय बिताने से आॅक्सीटोसिन बूस्ट होता है।

  • सुव्यवस्थित दिनचर्या एवं रात्रिचर्या का निर्धारण कर उसका पालन करें।
  • जैसे-ब्रह्म मुहूर्त में उठना, समय पर सोना, समय पर योग/प्राणायाम/व्यायाम,समय पर अभ्यंग(मालिश) एवं स्नान, समय पर ध्यान- साधना एवं आहार।
  • पौष्टिक एवं सुपाच्य आहार का ही प्रयोग करें।
  • यह आहार,स्नान, मालिश आदि स्वयं चिकित्सा है।
  • मन को नटखट बच्चे की तरह समझ कर उसके साथ व्यवहार रखें और नियंत्रित करें।
  • जिस प्रकार माता, घर के कार्य करते हुए भी बच्चे पर दृष्टि बनाए रखती है, और समय समय पर उसे टोकती है एवं नियंत्रित करती है, उसी प्रकार अपने मन पर दृष्टि एवं नियंत्रण रखना है।
  • अनावश्यक बातों पर मन जाने पर तत्काल मन को वहां से वापस लाना है।
  • निरंतर इसका अभ्यास करना है। क्योंकि जो आदत , संस्कार रूप में दृढ़ हो गयी है, उसे बदलने में कुछ समय लगता है। किन्तु बदलाव अवश्य होता है।
  • इस अभ्यास की अवधि में यदि वह कार्य हो ही जाता है जिसे आप बदलना चाहते हैं, जैसे क्रोध आना,तो मन को तुरंत नियंत्रित करना है। किन्तु बार बार ऐसा सोच कर कि पुनः गलती हो गई, स्वयं को दण्डित नहीं करना है। यह स्वयं के लिए ही हानिकारक होगा।
  • याद रखना है, आदत में बदलाव एक क्रमिक प्रक्रिया है, अभ्यास करते करते ही होगा।
  • अस्थिर मन को स्थिर करने के लिए, क्रोध शांत करने के लिए एवं अन्य बहुत सी समस्याओं को दूर करने के लिए आप एक्यूप्रेशर प्वाइंट्स का प्रयोग भी कर सकते हैं।
  • इस दिशा में अधिक लाभ के लिए धूम्र चिकित्सा का प्रयोग कर सकते हैं। जिसे होम ,सूक्ष्म यज्ञ, सूक्ष्म भवन आदि नामों से भी जानते हैं। आप साधारण रूप में शुद्ध लकड़ी (जैसे आम की लकड़ी) या गाय के गोबर के कमरे पर भी, गुड़, हवन सामग्री, विभिन्न औषधीय वनस्पति ( आवश्यकतानुसार) जैसे ब्राह्मी, शंखपुष्पी,अश्वगंधा, तुलसी आदि या फिर जैसे मैं मेधा क्वाथ का मिश्रण ही कभी कभी प्रयोग करती हूं, जला कर, इस वातावरण मे श्वास-प्रश्वास-प्राणायाम द्वारा लाभान्वित होते हैं।
  • मन परेशान होने पर, ईश्वर पर आस्था, महत्वपूर्ण चिकित्सा सिद्ध होती है। कर्म पर हमारा अधिकार है, फल पर नहीं। अतः स्वयं को कर्म पर ही केन्द्रित करने का प्रयास करना है। हमें ध्यान रखना है-
  • कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

मा कर्म फल हेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि

अर्थात तेरा कर्म करने में भी अधिकार है, कर्म के फल पर नहीं। अतः तू कर्म फल के प्रति आसक्त हो और साथ  अकर्मण्यता को भी प्राप्त हो। प्रथम का फल तो हमारे कर्म का द्वितीयक उत्पाद ( बाई प्राडक्ट) है। कर्म जितने अच्छे प्रकार से होगा, परिणाम उसी के अनुरूप होगा। अतः कर्म फल के प्रति नहीं, बल्कि कर्म के प्रति रुचि उत्पन्न करने से निरंतर सुखी एवं आनन्दित रह कर स्वास्थ्य को प्राप्त किया जा सकता है, कर्म के उत्तम परिणाम स्वत: मिलेंगे। परिणाम पर केन्द्रित व्यक्ति, कर्म के दौरान परेशान रह कर स्वास्थ्य एवं कार्य दोनों खराब कर लेते हैं।

  • क्रोध एवं अशांत मन को शांत करने के लिए तत्काल लम्बी सांस लेना, पानी पीना भी लाभकारी होगा।
  • यह सदैव ध्यान रखना है, कि दूसरा व्यक्ति आप की दृष्टि में गलत हो सकता है, किन्तु उसके स्वयं के दृष्टिकोण में वह सही होगा। दो व्यक्तियों के विचार, संस्कार सदैव एक जैसे नहीं हो सकते। और यह सोच कर कि दूसरा व्यक्ति हमारी बात नहीं मानता, या वह हमारे जैसा क्यो नही है, क्रोध करना, परेशान होना, हमारी स्वयं की दुर्बलता होगी, और यह हमारे भविष्य के लिए हानिकारक होगा।
  • हमें बार बार अभ्यास कर, अपनी कमजोरी को दूर कर, सुन्दर भविष्य का निर्माण करना है।
  • ध्यान रखिए-
  • मैं विश्व की आस हूं, समग्र मैं विकास हूं

मां भारती का लाल हूं, शौर्य का प्रमाण हूं

सूर्य मैं प्रभात का, पवन की सुगन्ध हूं

उठू मैं ब्रह्म बेल में, सूर्य से भी तेज हूं

अखण्ड पुरुषार्थ हूं, आरोग्य का प्रमाण हूं

योग सर्व श्रेष्ठ है,मै स्वयं योग हूं

देह में निवासरत्, स्वार्थ से मै हूं विरत्

ब्रह्म की मै ज्योति हूं,मै ब्रह्म से नही विलग

विश्व की मै कल्पना हूं, विश्व मैं ही रचता हूं

असम्भव को सम्भव करे, मैं वो ही गर्जना हूं

मैं विश्व की आस हूं, समग्र मैं विकास हूं

मां भारती का लाल हूं, शौर्य का प्रमाण हूं

आप की सहायता के लिए यहां मैं मेरे यू ट्यूब वीडियो के लिंक दे रही हूं।
















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