सौ प्रतिशत सफलता का मंत्र

 

डॉ कल्पना सिंह

सौ प्रतिशत सफलता का मंत्र

 


सौ प्रतिशत सफलता सभी सुनिश्चित करना चाहते है तो हमें सौ प्रतिशत स्वास्थ्य भी सुनिश्चित करना होगा। हम शारीरिक ,मानसिक,सामाजिक एवं भावनात्मक स्तर पर स्वास्थ्य की बात करते है। सभी स्तर पर स्वास्थ्य प्राप्त करने एवं बनाए रखने के लिए हम अलग अलग विचारधारा/मार्ग का अनुसरण करते है। निःसन्देह इन सभी स्तर पर स्वास्थ्य को बनाए रखना सफलता प्राप्ति का मूल मंत्र है। जो पूर्ण स्वस्थ है, उसे सफलता की तलाश नही करनी ,वह स्वयं सफलता है। इसी क्रम में या यू कहें कि इनके सार स्वरूप आज यदि वैचारिक स्वास्थ्य, दृढ़ इच्छाशक्ति, दृढ संकल्पशक्ति को सफलता का बीज मंत्र कहें, तो यह पूर्णतया सत्य होगा। यदि कोई स्वस्थ विचार को जन्म नही दे सकता, विचार करने पर भी यदि दृढसंकल्प नही रह सकता, वह कभी भी सफलता को प्राप्त नही कर सकता। एक पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति ही स्वस्थ विचारा को जन्म दे सकता है और दृढसंकल्पित हो कर्तव्य पथ पर बढतें हुए विजय को प्राप्त करता है। यहॉ हम बिन्दुवार उन माध्यमों को देखते है जिन्हे अपनाकर, सुविचारित एवं दृढसंकल्पित बनकर सौ प्रतिशत सफलता सुनिश्चित कर सकतें है-

1.योग-योग के द्वारा पूर्ण स्वस्थ रहकर, दृढसंकल्पित बनकर सफल जीवन प्राप्त किया जा सकता हैं।

2.आयुर्वेद-पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्ति में सहयोगी है।

3.आहार चिकित्सा-आहार के महत्व को समझकर, इसे औषधि के समान, आवश्यकतानुसार ग्रहण करना, पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्ति का माध्यम है।

4.मन मस्तिष्क पर अपना नियंत्रण रखते हुए प्रतिपल सकारात्मक एवं उत्साहित रहना।

5.धूम्र चिकित्सा-प्रतिदिन घर में होम करके इस धूम्र के सकारात्मक परिणाम से लाभान्वित होना।

6.दृढ विश्वास एवं उत्साह जागृत करने वाले साहित्य को पढना/सुनना। वस्तुतः मैं इसकी व्याख्या आहार चिकित्सा में ही करती हूॅ।

7.निरन्तर परिश्रम करते रहना।

            उपरोक्त उपायों को जीवन में अपनाकर स्वयं को सफलता के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। सफलता का अर्थ सुगमता बिल्कुल भी नही है। पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति भी सुगमता की खोज भी नही करता उसके लिए सुख एवं सफलता की परिभाषा ही अलग होती है। यह गूढ रहस्य वही समझ सकता है, जो सफलता को प्राप्त करता है।

राम, कृष्ण, जानकी हमारे पूर्वज रहे है। हम सभी जानते है कि इनके जीवन में सुगमता तो कभी नही रही। यह सभी कांटो से भरे पथ पर ही निरन्तर चलते रहे, किन्तु उन्हे आज भगवान कहते है, पूजा करते है। विचार कीजिए, क्यों? उनका धैर्य, त्याग, समर्पण, सुखदुःख में सम भाव रहना, निरन्तर कर्तव्य पथ पर बढतें रहना ही उन्हे भगवान बनाता है। इन गुणों को विकसित कर अपने पूर्वजों सा बनने के लिए उपरोक्त माध्यमों का अभ्यास अनिवार्य है। ऐसे ही नही भगवान कृष्ण को योगेश्वर कहते हैं।

           उपरोक्त अभ्यास से ही सृजन का बीज बना जा सकता है, जिसका मार्ग कोई भी अवरूद्व नही कर सकता।

 

सृजन का बीज बनकर जो जहॉ में फैल जाता है

कोई तूफां नही राहों को उसके रोक पाता है

भले बारिश भिगाए या उसे ऑधी उडा जाये

मगर वह आग है ऐसी पानी को जला जाए

सुरभित सुमन मै नित सुखद सौरभ बिखेरूगां

सुखद उत्सव हो या श्मशान मेरा पथ बदलेगा

कर्तव्य पथ पर मैं अडिग बढता चला जांऊ

अगर मेरी राह का कंटक बने,सागर भी पी जांऊ

राम को भगवान हम ऐसे नही कहते

उन्हे श्रृद्वा के अर्पित भाव हम यू ही नही करते

धर कर कदम जब अग्नि पर शीतल किया जग को

जग कह उठा वैभव सभी श्री राम तुम ही हो।

आप की सहायता के लिए यहां मैं मेरे यू ट्यूब वीडियो के लिंक दे रही हूं।

https://youtu.be/cWVvkRBPMMk

           https://youtu.be/Q-E8UiRA5Yw

https://youtu.be/7KPsnxt91R4

https://youtu.be/HywBPdHt6K4

https://youtu.be/AfwL4ysFtt4

https://youtu.be/aOaCsrqEY3g

https://youtu.be/lMNm0xsEP0I

https://youtu.be/ga8PM3zkDgI

https://youtu.be/Xvvps0zJFt4

https://youtu.be/aZRYufzSWho

 

 

 

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